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‘री-एडमिशन’ या ‘री-लूट’? हजारीबाग के प्राइवेट स्कूलों पर गंभीर आरोप, हर साल दोहराई जा रही ‘वसूली की कहानी

हजारीबाग: शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूल अब सवालों के घेरे में हैं, और इस बार मामला शहर के चर्चित कार्मल स्कूल, डीपीएस, डीएवी सहित अन्य प्राइवेट स्कूलों से जुड़ा है. कोई ऐसा प्राइवेट स्कूल नहीं है जो इस लूट में शामिल नहीं है.

री-एडमिशन, ड्रेस, किताब, डेवलपमेंट फीस के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम वसूलने का आरोप कोई नया नहीं, लेकिन इस बार गुस्सा उबल पड़ा है. आधा दर्जन से अधिक अभिभावक शिकायत लेकर शिक्षा पदाधिकारी के दरवाजे तक पहुंच गए हैं, जिससे पूरे जिले में हड़कंप मच गया है.

अभिभावकों का सीधा सवाल

अभिभावकों का साफ कहना है कि जब बच्चे पहले से ही उसी स्कूल में पढ़ रहे हैं, तो हर साल री-एडमिशन, डेवलपमेंट फीस के नाम पर फीस क्यों. यह न सिर्फ अनुचित है, बल्कि शिक्षा विभाग के नियमों का खुला उल्लंघन भी है. हैरानी की बात यह है कि यह ‘री-एडमिशन फीस’ वर्षों से वसूली जा रही है, और हर बार अधिकारी जांच और कार्रवाई का आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं.

जांच के आदेश, लेकिन भरोसा कम

शिक्षा पदाधिकारी ने इस बार भी जांच के आदेश दिए हैं और साफ कहा है कि री-एडमिशन जैसा कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार भी वही होगा जो हर साल होता आया है. क्यों इन अधिकारियों की बात स्कूल प्रबंधन नहीं मानता. क्या ये इतने नाकाबिल हैं. या फिर ऊपर से कुछ और, अंदर कुछ और खेल चलता है. या फिर ये अधिकारी इतने गए-गुजरे हैं कि स्कूल प्रबंधन उन्हें ठेंगा दिखा देता है.

हर साल दोहराई जाती है कहानी

मार्च का महीना आते ही अभिभावकों का दर्द सामने आता है, हंगामा होता है, फिर आश्वासनों की चादर ओढ़ाकर सब शांत कर दिया जाता है. असल पीड़ा उन आम परिवारों की है, जिनकी सीमित आय पर यह अतिरिक्त बोझ पहाड़ बनकर टूटता है. सरकारी कर्मचारी या बड़े व्यापारियों के लिए यह रकम मामूली हो सकती है, लेकिन मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सीधी लूट जैसा है.

सिस्टम ने बना दी परंपरा

और जब एक बार पैसे जमा हो जाते हैं, तो अभिभावकों का गुस्सा भी धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है. यही वह सिस्टम है, जिसने इस वसूली को परंपरा बना दिया है. कभी यह मामला जनप्रतिनिधियों तक भी पहुंचा, लेकिन जवाब मिला कि सरकारी स्कूल में पढ़ाइए. सवाल यह है कि क्या यही समाधान है. या फिर प्रशासन और निजी स्कूलों की ‘सेटिंग’ ने इस लूट को संरक्षण दे रखा है.

अब कार्रवाई या फिर औपचारिकता?

अब देखना यह है कि इस बार भी ‘जांच’ सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगी या फिर सच में कोई ऐसी कार्रवाई होगी, जो इस साल नहीं, आने वाले हर साल की ‘री-लूट’ पर हमेशा के लिए ताला लगा दे.

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